आँगन की गौरैया: बाल विवाह के विरुद्ध एक सशक्त हिंदी नाटक | लेखक: सौरभ कुमार
"आँगन की गौरैया"
एक विस्तृत और भावुक नाटक
लेखक: सौरभ कुमार
मुख्य पात्र (Characters):
- नन्ही (13 वर्ष): चंचल, होनहार, जिसे पढ़ने का शौक है।
- कमला (माँ): ममतामयी पर समाज से बेबस।
- बिहारी (पिता): कर्ज में डूबा एक लाचार किसान।
- मास्टर जी: बदलाव लाने वाले जागरूक अध्यापक।
- दादी: रूढ़िवादी विचारधारा की प्रतीक।
अंक 1: सुनहरे सपनों का अंत
(स्थान: गाँव का घर। नन्ही अपनी स्कूल ड्रेस पहनकर खुश है और मास्टर जी की शाबाशी का जिक्र कर रही है।)
नन्ही: माँ! देखो, मास्टर जी ने मेरी कॉपी पर 'शाबाश' लिखा है। मैं एक दिन बड़े स्कूल जाऊँगी!
बिहारी: (अंदर आते हुए) कमला, नन्ही का बस्ता आज से खूंटी पर टांग दो। अगले महीने इसकी शादी है।
अंक 2: परंपरा और ममता की जंग
(रात का समय। कर्ज और परंपरा के बीच बिहारी और कमला की बहस।)
कमला: वो अभी बच्ची है! उसने अभी अपनी गुड़िया तक नहीं छोड़ी है।
बिहारी: तो क्या करूँ? साहूकार का कर्ज बढ़ता जा रहा है। जमीन चली गई तो हम सब भूखे मरेंगे।
दादी: लड़की तो पराया धन होती है। जितनी जल्दी हाथ पीले कर दो, उतना अच्छा।
अंक 3: सिसकियों का सावन
(शादी का दिन। नन्ही लाल जोड़े में सजी है और रो रही है। मास्टर जी का पुलिस के साथ प्रवेश।)
नन्ही: माँ, मुझे मत भेजो। मैं बहुत कम खाऊँगी, मैं सारा काम करूँगी, पर मुझे स्कूल जाने दो।
मास्टर जी: रोकिये यह तमाशा! बिहारी, यह जुर्म है। मुझे तो सिर्फ एक डरी हुई बच्ची दिख रही है जिसके पंख तुम कुचलना चाहते हो।
अंक 4: एक नई सुबह
(नन्ही खड़ी होती है और अपनी चूड़ियाँ उतारकर जमीन पर फेंक देती है।)
नन्ही: बापू... क्या प्यार का मतलब मुझे बेच देना है? मैं पढ़ना चाहती हूँ, मैं जीना चाहती हूँ!
बिहारी: (रोते हुए) मुझे माफ कर दे लाली... मैं जेल जाने को तैयार हूँ, पर तेरी बलि नहीं चढ़ाऊँगा।
"अभी तो पैरों की पायल भी ठीक से नहीं खनकी थी,
अभी तो हाथों की मेहंदी का रंग भी कच्चा था।
तोड़ दीं वो जंजीरें जो उसे जकड़ने आई थीं,
क्योंकि वो बच्ची थी, मगर उसका हौसला सच्चा था।"
-- पर्दा गिरता है --
अभी तो हाथों की मेहंदी का रंग भी कच्चा था।
तोड़ दीं वो जंजीरें जो उसे जकड़ने आई थीं,
क्योंकि वो बच्ची थी, मगर उसका हौसला सच्चा था।"
-- पर्दा गिरता है --
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Top Tags: Hindi Natak Social Awareness Child Marriage Education Drama Script Sourabh Kumar Jharkhand Literature Beti Bachao Social Reform
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