अभी तो गुड़िया भी नहीं सोई: बाल विवाह पर मार्मिक हिंदी नाटक | लेखक: सौरभ कुमार
"अभी तो गुड़िया भी नहीं सोई"
लेखक: सौरभ कुमार
पात्र (Characters):
- लाली (12 वर्ष): एक चुलबुली लड़की जिसे पढ़ना बहुत पसंद है।
- सुमित्रा (35 वर्ष): लाली की माँ।
- रामलाल (40 वर्ष): लाली के पिता।
- दादी (60 वर्ष): पुराने ख्यालों वाली महिला।
दृश्य 1: घर का आंगन (शाम का समय)
(लाली जमीन पर बैठकर अपनी फटी हुई किताब को गोंद से चिपका रही है।)
लाली: "मछली जल की रानी है... जीवन उसका पानी है..." माँ! देखो, मैंने अपनी किताब ठीक कर ली। कल स्कूल में मास्टर जी नया पाठ पढ़ाएंगे।
दादी: (बड़बड़ाते हुए) अब उस किताब का अचार डालेगी क्या? वैसे भी चार दिन बाद उसे पराए घर जाना है।
दृश्य 2: रात का समय (माता-पिता का कमरा)
(रामलाल सूटकेस में कुछ कपड़े रख रहा है। सुमित्रा कोने में सिसक रही है।)
सुमित्रा: अभी तो उसकी खेलने की उम्र है। क्यों उसे आग में झोंक रहे हो?
रामलाल: (गुस्से में) तो क्या करूं? तीन बेटियां हैं मेरी। हाथ से मौका निकल गया तो उम्र भर कुंवारी बैठी रहेगी।
दृश्य 3: विदाई का समय (अगली सुबह)
(लाली ने लाल रंग का भारी जोड़ा पहना है। वह अपनी गुड़िया को सीने से चिपकाए खड़ी है।)
लाली: (रोते हुए) माँ, मुझे डर लग रहा है। क्या मैं वहां अपनी गुड़िया ले जा सकती हूँ?
सुमित्रा: मेरी बच्ची... मुझे माफ कर देना।
अंतिम दृश्य
(पृष्ठभूमि में एक दर्द भरा संगीत और भारी वॉयसओवर सुनाई देता है।)
वॉयसओवर: "आज फिर एक बचपन अर्थी पर नहीं, डोली में विदा हो गया। कब तक गरीबी और परंपरा के नाम पर हम अपनी बेटियों का गला घोंटते रहेंगे?"
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Tags: Hindi Natak Sourabh Kumar Child Marriage Social Issues Education Jharkhand Awareness Skit Script Beti Bachao
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